दर्द
दर्द
दर्द है कि निकलता नहीं
बर्फ है कि पिघलता नहीं
सभ्यता की ऊँची दीवारों से
भर गया है शहर
चाहता हूँ चीखना मगर
स्वर गले से निकलता नहीं
काश महानगर में
होता कोई कोना
जहाँ मुक्त होकर हम
चिल्ला पाते और
निकाल डालते वह गुबार
जो बर्फ को पिघलने
से रोकता है
और छीन लेता है
हमारी आंतरिक स्वतंत्रता !
परन्तु शायद हमने
चीखने का जिम्मा
यंत्रों को दे दिया है
जिनमें कोई दिल
कभी धड़कता नहीं,
दर्द है कि निकलता नहीं
बर्फ है कि पिघलता नहीं
और हम रह जाते हैं
अपने ही दिए श्राप से
अभिशापित !
