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S N Sharma

Abstract Tragedy Classics

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S N Sharma

Abstract Tragedy Classics

दिल से लगाए बैठे हो।

दिल से लगाए बैठे हो।

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मन तो करता है तुमसे मिलने को बात करने को।
 मगर तुम हो कि वेबात ही यूं मुंह फुलाए बैठे हो।

 माना मैंने कि रूठना मनाना प्यार की रवायत है।
इस रवायत को तुम क्यों दिल से लगाए बैठे हो।

इस तरह रूठ कर अगर हम भी जो चले जाएं तो।
इस दिल को क्यों तोड़ने का सामान लिए बैठे हो।

 जमाने ने भला की पसंद कब यह बेकार की बातें।
 तुम सरेआम इस इश्क का इजहार किए बैठे हो।

 अब चले भी आओ मीत निभाने को प्रीत की रस्में।
 क्यों मेरे यार अब बेकार की तकरार लिए बैठे हो।


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