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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

"दीपक"

"दीपक"

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फैलाता वो तो सदैव ही प्रकाश है

दीपक तो एक ऐसा व्यक्ति खास है

अंधेरे की निकालता, हरपल सांस है

इसमें सिर्फ नेकी का ही होता वास है


कुछ तो घमंड कारण हुए बदनाम है

उजाले का हुआ, उन्हें जो अभिमान है

घमंड, अहम भी तो अंधेरे के समान है

कुछ दीपक बढ़ा रहे, अहम की शान है


गर भीतर का न मिटता अंधकार है

फिर तो व्यर्थ ही बाहर का उजास है

अंदर फैला यदि प्रकाश ही प्रकाश है

फिर अँधेरा भी देने लगता उजास है


वही दीपक स्वप्न करता साकार है

जो सत्य के लिए जलता लगातार है

जो कार्य करता सदैव परोपकार है

रब उसको मंजिल का देता, उपहार है


जो दीप हो दूजो से जले हजार बार है

वो लोग ईर्ष्यालु धुंए के तार दाग़दार है

वो उजाला न, तम फैलाते कलाकार है

वो दीप नाम करते, बदनाम बार-बार है


जो दीपक जैसे भले दिखते ख्वाब है

पर भीतर रखते, वो घना, अंधकार है

उन छद्म दीपक से हो, तू सावधान है

वो दीपक नही, वो लोग तो मक्कार है


असल दीपक जलता, आठो याम है

चाहे खुद का जले ओर मिटे नाम है

मिटा देते अंततः तम नामोनिशान है

सत्य दीपों को कर, तू नित सलाम है


सच्चा दीपक, सिपाही के समान है

जिसके लिए मातृभूमि, भगवान है

एक दीप जलाये इंसानियत नाम है

जिससे भाईचारे से रहे, यह अवाम है


जब बढ़ती भाईचारा दीप तादाद है

तब मिटता अंधेरे का वाद-विवाद है

फैल जाता चहुँओर प्रकाश संवाद है

जलाओ सब भीतर दीपक नौशाद है


खुदा भी कह उठेगा, इरशाद-इरशाद है

भीतर के दीपक की जलाओ तो आग है

फिर देखो अमावस बनेगी पूनम रात है

दीप में आग नहीं, जलता आत्मविश्वास है



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