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Manisha Wandhare

Abstract

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Manisha Wandhare

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धूप साया बन चुकी है...

धूप साया बन चुकी है...

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जिंदगी रही ना आसान ,

अब धूप साया बन चुकी है,

हुए पसीने से लथपथ ,

फिर भी जाड़ा बन चुकी है ...

नादान थे हम खोज रहे थे,

जो मिला गलती बन चुकी है ...

यूं ठोकरें खाकर चले थे ,

रास्ते के काटें सुई बन चुकी है...

एक जमाना था हमारा ,

दिलरुबा ख्वाब बन चूकी है ,

इतराए तो इतराए किसपर,

बहार पतझड़ बन चुकी है ...

दुःखों से इतना वास्ता है,

जीने का सलीका बन चुकी है ,

खुशी किसे कहते है ,

नजर अंदाज चिज बन चुकी है ...

मरहम ना लगाए कोई ,

जिंदगी दवा बन चुकी है ,

रोते हुए हँसना सीख लिया,

वक्त बेवफा बन चुकी है...



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