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Sunita Shukla

Abstract

4.5  

Sunita Shukla

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धरती की व्यथा-कथा

धरती की व्यथा-कथा

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धू-धू कर जलते जंगल, 

सूने वन और बंजर धरती ।

काट-काट सब वृक्षों को, 

सूनी कर दी माँ की गोदी।।


तार-तार धरती का आँचल, 

छलनी कर दिया सीना ।

प्राण वायु और पानी के बिन,

हो जाये अब अंत कहीं ना ।।


जीव-जन्तु कर रहे पुकार, 

मचा हुआ है हाहाकार ।

इंसानों के कर्मों का फल, 

भुगत रहे निरीह नादान।।


आखिर कब तक ये तरसेेेंगे,

जाने कब बादल बरसेंगे ।

धरती की तब प्यास बुझेगी,

सब मिल जब नयेे वृक्ष हम रोपेंगे।।


खिल उठे वसुधा का आँचल, 

कण-कण में बिखरे मुुुस्कान।

आओ हम सब मिलकर बढ़़ायेें,

अपनी धरती माँ की शान।।


          


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