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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Children

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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

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धरती की आस

धरती की आस

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धरती के मन में थी एक आस।

वो व्याकुल थी भारी, लगी प्यास।।


झुलस -झुलस काया हुई बंजर।

बिरहन हृदय में चलते खंजर।।


पुलकित हो ईश्वर से ध्यान लगाया।

दुःखी धरा ने मनचाहा वर पाया।।


धरती की खाली झोली भर दी।

सूखे तन पर जलधार दी।।


भीगा धरा का अंग- अंग।

बहे नदिया धारा- हिलोरें संग- संग।।


पृथ्वी हो गई हरी-भरी।

नदी, पेड़ ,पर्वत लगें मनोहारी।।


पशु-पक्षी, कीट- पतंगे गाते प्रेम गीत।

मेंढक, झींगुर रातों को बजाते संगीत।।


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