धरती का कर्ज
धरती का कर्ज
मैं, धरती बिलखती कहती हूँ,
हे मानव।
मैने अपने गर्भ से जन्म दिया तुझ को
और सींचती रही अपने रक्त से,
अनगिनत प्रहार किये तुने मुझ पर
अपनी स्वार्थ की कुल्हाड़ी से,
मगर हर बार मैने अपनी प्रकृति की
गोद में तुझ को सुलाया है,
बहुत ले ली तूने मेरे धैर्य की परीक्षा,
अब मेरा ह्रदय द्रवित नहीं हो सकता है,
सिर्फ कांटे छोड़ दिये मेरे तन पर,
अब फूल नहीं खिल सकता है,
सदियो तक बरसाती रही अमृत,
मगर अब जहर ही बरस सकता है,
विवश हूँ मैं तेरे कुकर्मो के अधीन,
अब सिर्फ सर्वनाश ही हो सकता है,
तुम रहो इन पत्थरों के खंडहरों में,
अब प्रकृति का साया नहीं मिल सकता है,
तू उड़ सकता है अहम की ऊँचाईयों में,
मगर पावन धरती का स्पर्श नहीं पा सकता है,
बसंत में भी रहेगा पतझड सा मंजर,
अब तू सावन में मल्हार नहीं गा सकता है,
उतर गई पेड़ों से बेलों की रौनकें,
अब तू शहद सा मीठा फल नहीं खा सकता है,
मैं स्वयं हो गई भस्म अब तू मेरा
दाह संस्कार नहीं कर सकता है,
मैने हक दिया था हर मानव को अपने पुत्र समान,
मगर अब तू मेरा पिण्डदान नहीं कर सकता है,
मदमस्त हो जा आधुनिकता के अभिशाप में,
अतीत का आशीर्वाद नहीं मिल सकता है,
बेशुमार कमा ले दौलत शोहरत,
मगर धरती का कर्ज नहीं चुका सकता है।।
