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Rashi Saxena

Abstract

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Rashi Saxena

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धरा पावनी

धरा पावनी

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धरा पावनी हर्षित है,

 देख नजारा

अपनेपन का/

 देकर छतरी मानवता की

जला मशाल

दे संदेशा ये जन-जन को

मानव मन में सदा बहे

दया धर्म की दरिया

बनी बालिका

आज सहायक जैसे

करते रहें 

यही सब काज

भूखा रहे न कोई जग में

पर पीड़ा का हो

अहसास

 सच्ची पूजा की

 करें देवता भी

दरकार।।



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