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Jyotshna Rani Sahoo

Classics Inspirational

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Jyotshna Rani Sahoo

Classics Inspirational

दहलीज

दहलीज

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दहलीज ख़्वाब की मैं पार ना कर पाई

बस मेरी नहीं मेरा ख्वाबों की हुई थी विदाई।


सपनों के लिए आंगन नहीं नींद चाहिए

पर में खुली आंख कुछ ख़्वाब थी सजाई।


कोई नहीं समझे जब मुझे ख़्वाब क्या चीज है

पर मैं वहां नासमझ नादान से समझदार बन गई।


छोड़ बाबुल की आंगन दुजी आंगन मिला था

मैं फिर भी वहां प्यार का एक मंदिर बनाई।


में स्वीकार नहीं थी बेटी बनकर जहां

मैं बहू बनकर जिंदगी भर अपना घर बसाई।


मुझसे ख़्वाब छीन थमा दिया गया कुछ जिम्मेदारी

मैं भी नारी होने का सही अर्थ निभाई।


नफ़रत कभी भेट में तो कभी पेट में

पता नहीं कैसे मैं सबके बदले बस प्यार लुटाई।


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