चलते चल
चलते चल
लक्ष्य से ना हट कभी ए गांठ मन में बांधे चल
प्रतिपल कदम मिला के सत्यता से बढ़ते चल।।
खोई-खोई किस्मतों के रास्ते बनाते चल
रो पड़े ए पांव तेरे फिर भी मुस्कुराते चल।।
हर कदम नई उमंग से ज़ोर तू लगाते चल
पर्वत ए है क्या चीज़ खाक में मिलाते चल ।।
रास्ते में बिखरे कांटे दूर तू हटाते चल।।
इस जहां से पापियों के पाप को मिटाते चल
मिट गए मिटा दिए अधर्म को झुकाते चल
सत्य की सदा विजय ए राग गुनगुनाते चल ।।
रब़ ने दी बड़ी जतन इसे आसमां छूआते चल
है क्या चीज़ इस जहां का आज तू बता के चल।।
