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सीमा शर्मा सृजिता

Romance Classics

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सीमा शर्मा सृजिता

Romance Classics

चाँद भी आज हुआ बैरी

चाँद भी आज हुआ बैरी

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खिड़की पर बैठी रही ताकती विरहन

वो दीवानी सी 

प्रेम अगन में रही तरसती 

जोगन वो मस्तानी सी 


चांदनी रात में चांद के सामने 

कितनी कसमें कितने वादे 

हाथ थामकर किये पिया ने 

चैन न आये सोच जिया में 


इन्तजार में आज भी बैठी 

आयेगा वो हरजाई 

वो तो भूल गया है उसको 

प्रीत भी उसकी बिसराई 


रोज रात को घंटों बैठकर 

यादों में वो खो जाती 

पिया मिलन की आस लिये 

मन ही मन वो मुस्काती 


दर्द हुआ है आज बहुत ही 

आंख आज है अश्रु भरी 

पिया के जैसे चांद न आया 

चांद भी आज हुआ बैरी।


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