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Surendra kumar singh

Abstract


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Surendra kumar singh

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चाहत सी जिंदगी

चाहत सी जिंदगी

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चाहत सी ज़िन्दगी है तुम्हारी  

सुरेन्द्र लेकिन तुम

चाहत भर नहीं हो,

जैसा कि सोचते हो

केवल और केवल

परमात्मा तुम्हारे साथ हैं

और वो तो कुछ करते नहीं।


तुम्हारे होते हुये भी

तुम्हारे न होने के बाद की

अनगिन कहानियां हैं

और कहानीकारों के

अपने अपने धंधे हैं

किराये की पटकथा की तरह

भाड़े की सेना की तरह।


जाने कितनी सम्वेदनशील लम्हे

नेपथ्य में हैं

कागजों में जीवित होने की

उम्मीद में

और तुम एक और कहानी बन

रहे हो,

क्यों कि तुम्हारा परमात्मा का साथ

अलग बात है।


परमात्मा पर विश्वास करने वाले

अलग किस्म के लोग हैं दुनिया में,

और तुमसे प्रेम करने वाले भी

इस दुनिया मे कम नहीं है

ये बात और है कि

तुम परमात्मा के साथ हो

इस पर यकीन

तुमसे प्रेम करने वाले भी उतना

नहीं करते

जितना कि तुम्हारा है।


हमने देखा है सुरेन्द्र

पत्थरों को पिघलते हुये

पर कागज चीख तो सकते हैं

मचल तो सकते हैं

कुछ कह तो सकते हैं

पर पिघल नहीं सकते

गुनगुनाते जरूर हैं।


मुझे कभी कभी लगता है कि

तुम ठीक ठीक अपनी तरह हो

और दुनिया ठीक ठीक

तुम्हारी तरह होनी चाहिये

आखिर तुम्हारी उस फिक्र का क्या है

लोग अपना खयाल नहीं रखते

जैसा कि तुम सोचते हो।


तुम्हारी अकेले अपने परमात्मा के

साथ साथ

जाने कितने अंतर्विरोधों के बीच

दुनिया को अपनी दिशा में 

सक्रिय करने की ये चाहत

अच्छी लगती है


और हम भी तुम पर मुग्ध हो

 देखते रहते हैं तुमको

दुनिया की तरह

काश हम भी हो पाते

तुम्हारी तरह।


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