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Rajeev Tripathi

Tragedy

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Rajeev Tripathi

Tragedy

बुढ़ापा एक पीड़ा

बुढ़ापा एक पीड़ा

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माता-पिता की पीड़ा को

कोई समझ ना पाए

बच्चों की परवरिश करते करते

एक बाप बूढ़ा हो जाए 

माता-पिता की लोरी सुनकर

जो बच्चा ख़ूब इठलाए 

वही बेटा है जवान होकर के

अपने माँ-बाप को भूल जाए 

वृद्धाश्रम में भेज कर मांँ बाप को

पुत्र तनिक नहीं लज्जाए 

बूढ़ा पिता अपनी परवरिश में

कोई कमी ना पाए 

फ़िर क्यों बच्चा बड़ा होने पर

उन्हें वृद्धाश्रम पहुंँचाए 

वृद्धावस्था में तो व्यक्ति

दिन गिन रहे होते हैं

न जाने उनकी कब मृत्यु हो जाए

व्यक्ति कशमकश में होता है

कौन अपना है वो किसको आजमाएंँ

ख़ून के आंँसू जहांँ पानी हो जाए

ऐसे हालात में किस पर ऐतबार कर पाए

प्रभु स्मरण में बूढ़े मांँ बाप

और भला क्या चाहे

उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को

एक पुत्र पूरा ना कर पाए

टूटा हुआ चश्मा छूटी हुई

लाठी का सहारा कोई नहीं बन पाए

बदले में बूढ़ा बुढ़िया ही सुनने में आए

छोटी-छोटी खुशियों में ही

बुढ़ापा जैसे तैसे कट जाए।


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