बोलो ना।
बोलो ना।
आखिर फेंक ही दिये ना
अल्फाजों के कंकर
तुमने ...
इस खामोश झील में
ला ही दिया ना
बवंडर..
ठहरे से जल में
और हां ...
सच है कि
सुनामी तो
आ जाती है
विचारों की
भावों की
और शब्दों की
और एहसासों
की नदी
आंखों से उतरकर
उफान पर होती है
और बहने लगती है
खाली सफ़हों पर
कभी कभी तो...
तूफान इतना
उमड़ता है
कि सचमुच
हर एहसास
उखड़ा सा लगता है
जैसे कोई सिरा
छूटा सा लगता है
शब्दों में बांधकर
हर एहसास
करती हूं कोशिश
बवंडर के बाद
जैसे सब
सहेजने की
संभालने की
जोड़ती हूं मन के
ढूंढती हूं सिरा
उन एहसासों का
जो अनजाने
मुझसे लिपट कर
झकझोर देते हैं मुझे
सहसा उग आती है
मखमली दूब
बीहड़ जंगल में
छनकर आती है
गुनगुनी धूप...
और अन्ततः
खयालों की
सुनामी के बाद
उपजती है
कविता ...
और उभर आते हो
तुम हर एक हर्फ में
और दे जाते हो
पुनः मुझे
जीवन्त होने की वजह
सदा सर्वदा
मिलोगे ना मुझे
मेरी जिन्दगी बनकर
मेरी कविता बनकर
रहोगे ना मेरे साथ
जीवन पर्यन्त
मेरा विश्वास बनकर
बोलो ना ...बोलो ना।
