तुम ही हो
तुम ही हो
अपने में समेटे कई युग और कई काल,
होते हैं वो व्यक्तित्व विशाल,
सुना है होता है हर खज़ाना उनके
पास, होते हैं वो बहुत मालामाल,
रब ने उन्हें कुछ ऐसा दिया है,
जिन्होनें इस जहाँ पर सब कुछ
लुटा दिया है,
सोच में हूँ कि होते हैं हमारे
जैसे ही उनके सिर, हाथ और पाँव,
पर उनकी छत्रछाया देती है शीतलता जैसे
बरगद की छाँव,
मैंने देखा है उन्हें यूँ जिंदगी जीते हुए,
अपने आंसू छिपा कर दूसरों के गम
हंसकर पीते हुए,
ज़ख़्म परायों पर अपने हाथों से मलहम
लगाते हुए,
आम इंसानों से ऊपर उठकर अपनी
अलग पहचान बनाते हैं वो,
क्यों इस धरती पे आते हैं वो,
अपने कर्मों से दिलों में बस जाते हैं वो,
सोच में हूँ कौन उन्हें इंसानियत सिखाता है,
हम सबका तो एक ही विधाता है,
वो कहते हैं एक से नहीं हर दिल से
हमारा नाता है,
सोच में हूँ कि होते हैं हमारे
जैसे ही उनके सिर, हाथ और पाँव,
पर उनकी छत्रछाया देती है शीतलता जैसे
बरगद की छाँव,
माना तुम्हें और मुझे नहीं है फुर्सत ज़माने के लिए ,
कुछ भटकते हैं इंसान दूसरों पे इलज़ाम लगाने के लिए,
दर्द देकर दूसरे को क्या किसी ने पाया है सुकून,
क्या कहें इस ज़माने में हैं सबको अलग-अलग जनून,
जो भी गम का मारा है उसे सीने से लगा लेते हैं वो,
हर दर्द पराया अपने दिल में समा लेते हैं वो,
बन के हमराही भी चल देंगे कभी अगर लगे
तुम्हें हमसफ़र कि कमी,
हाथ में लेकर हाथ तुम्हारा बन जाते हैं
तूफानों में सहारा,
डूबने नहीं देंगे किश्ती तुम्हारी
ऐसी प्यारी सी इंसान थी नानी हमारी,
सोचो कौन सी दुनिया बन के आते हैं वो,
कितना प्यार भरा होगा इनके दिल में ,
जो पूरे संसार पर भी लुटाते हैं,
सोच में हूँ कि होते हैं हमारे
जैसे ही उनके सिर, हाथ और पाँव,
पर उनकी छत्रछाया देती है शीतलता जैसे
बरगद की छाँव,
आज दुनिया कि हकीकत जान कर लगता है,
क्यों पड़े इस झमेले में,
आना-जाना तो लगा ही रहता है दुनिया के
इस मेले में,
ढह जाने वाली रेतों पर तो हर कोई आशियाना
बनाता है,
जो दिलों में आशियाने बनाते हैं कौन हैं वो,
जो दिलों में बस जाते हैं बहुत याद आते हैं,
बसा कर ऐसे लोगों को दिल में हम खुद को
तन्हा नहीं पाते हैं,
मेरे जीवन में नानी तुम ही हो मेरे बरगद की छाँव,
ढूंढ़ने पर नहीं मिलती है जो घूम लूँ चाहे कितनी
गलियां कितने शहर और कितने ही गाँव,
याद आती है तुम्हारी कितनी प्यारी सखी सी
बन कर तुम्हारे संग है जिंदगी गुजारी,
मेरे आंसूंओं को अपने दामन में समेट लेतीं थी तुम,
और खुशियों का खज़ाना लुटाती थीं तुम,
मेरी ही नहीं परिवार के सभी लोगों कि
उलझनें कितनी आसानी से सुलझातीं थीं तुम,
अगर हुआ कभी कोई गमगीन घर में तो,
उसे चुटकुले सुना-सुना कर हंसाती थीं तुम,
कहाँ चलीं गयीं कभी अगर ख्याल आया,
तो नज़रों से तो आंसू छलके मगर दिल
को यही समझाया है,
तुम्हें मैंने दिल में और यादों में बसाया है,
तुम ही तो हो जिनकी यादों से
ही जिंदगी में शीतल छाया है,
तुम्हारे जैसा तो कोई मेरा बरगद नहीं बन पाया,
सोच में हूँ कि होते हैं हमारे
जैसे ही उनके सिर, हाथ और पाँव ,
पर उनकी छत्रछाया देती है शीतलता जैसे
बरगद की छाँव।
