Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Lakshman Jha

Tragedy


3  

Lakshman Jha

Tragedy


बन्दर बाँट

बन्दर बाँट

1 min 177 1 min 177

जश्न तो हम ऐसे

मना रहे हैं,

अपने दुश्मनों को

कोई अच्छा

सबक सीखा रहे हैं !


अब बन्दर बाँट

वहां की धरती की होगी,

फिर लोगों का

जमाबड़ा होगा

और फिर महफिल सजेगी !


370 को हटा कर

लगता है कोई

खजाना मिल गया,

अपने ही लोगों के

कलेजे पे दाल दलना

सीखा दिया !


विकास के सब्ज बागों

को दिखा के

उनको कैद कर दिया,

टेलीफोन, इंटरनेट सुविधा

को पंगु बना दिया !


घर से बाहर निकलना

उनका दूसबार हो गया,

कैद में रखकर सभी को

कैदी बना दिया !


कहते हैं "वे तो अपने हैं "

फिर उनकी आज़ादी

कहाँ गयी ?

अपने दर्द को कह नहीं सकते

उनकी चाहत

कहाँ गयी ?


अपनी व्यथाओं से कोई

कराह रहा है

उसकी किसी को

परवाह नहीं,

उसके घर की बोली

किसी को रुकवाने

की चाह नहीं !


जब तक हम उनके

जख्मों को भर

ना सकेंगे,

तब तक हम जीवन भर

उसके हो ना सकेंगे।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Lakshman Jha

Similar hindi poem from Tragedy