बंदिनी
बंदिनी
ये कींच से लबालब दलदल
रोज़ उसे डुबोती है
रोज़ बंदिशों में वो
अपनी अस्मिता खोती है
कोई हाथ ये पकड़ कर
उसे रास्ता दिखा दो
आज़ादी की उस लौ को
कोई तो जला दो!
इस घुप्प अँधेरे में उसको
बहुत डर लगता है
सूरज की रोशनी को उसका
अंतर्मन तरसता है
कोई दर्द तो समझो,
बेड़ियाँ बहुत पीड़ा देती हैं
ये कींच से लबालब दलदल
रोज़ उसे डुबोती है
रोज़ बंदिशों में वो अपनी
अस्मिता खोती है
कोई हाथ ये पकड़ कर
उसे रास्ता दिखा दो
आज़ादी की उस लौ को
कोई तो जला दो!
मुक्त होना चाहती है
वो घुटन भरे संसार से
नफरत है उसको उस
जिस्म के बाजार से
एक उम्मीद बाकी है
दिल में आज़ादी की
नहीं भाती है उसको
धोखे से मिली ज़िन्दगी
ये कींच से लबालब,
दलदल रोज़ उसे डुबोती है
रोज़ बंदिशों में वो
अपनी अस्मिता खोती है
कोई हाथ ये पकड़ कर
उसे रास्ता दिखा दो
आज़ादी की उस लौ को
कोई तो जला दो!
