STORYMIRROR

Anita Sharma

Tragedy Action

4  

Anita Sharma

Tragedy Action

बंदिनी

बंदिनी

1 min
263

ये कींच से लबालब दलदल

रोज़ उसे डुबोती है 

रोज़ बंदिशों में वो

अपनी अस्मिता खोती है 

कोई हाथ ये पकड़ कर

उसे रास्ता दिखा दो 

आज़ादी की उस लौ को

कोई तो जला दो!

इस घुप्प अँधेरे में उसको

बहुत डर लगता है 

सूरज की रोशनी को उसका

अंतर्मन तरसता है 

कोई दर्द तो समझो,

बेड़ियाँ बहुत पीड़ा देती हैं 

ये कींच से लबालब दलदल

रोज़ उसे डुबोती है

रोज़ बंदिशों में वो अपनी

अस्मिता खोती है 

कोई हाथ ये पकड़ कर

उसे रास्ता दिखा दो

आज़ादी की उस लौ को

कोई तो जला दो! 

मुक्त होना चाहती है

वो घुटन भरे संसार से 

नफरत है उसको उस

जिस्म के बाजार से 

एक उम्मीद बाकी है

दिल में आज़ादी की 

नहीं भाती है उसको

धोखे से मिली ज़िन्दगी 

ये कींच से लबालब,

दलदल रोज़ उसे डुबोती है 

रोज़ बंदिशों में वो

अपनी अस्मिता खोती है 

कोई हाथ ये पकड़ कर

उसे रास्ता दिखा दो

आज़ादी की उस लौ को

कोई तो जला दो!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy