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Anju Singh

Abstract


4.4  

Anju Singh

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बिजलियां

बिजलियां

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मौसम भी जाने कितने 

खेलता है अठखेलियां

मानो आसमान से गिरा रहा हो

ये कड़कती बिजलियां


बारिश की बूंदें

राहत बरसाती हैं

पर ये चमकती बिजलियां 

कहर ढा जाती हैं


घनघोर अंधेरी रातों में

जब बिजली कड़कती है

क्रोध में आकर शायद

अग्निशिखा सी निकलती है


मेघों संग बरसकर

लाती आसमां में प्रकाश

गिर जाती है अगर किसी पर

कर देती उसका विनाश


चमक गरज के साथ आती

हर किसी को खूब डराती

बिजली बन कर कभी गरजती

बदली बन कर फिर बरसती


बादलों से होती है जब

बिजली की मुलाकात

गरजती है बिजली 

और होती है बरसात


इन कड़कती बिजलियों ने 

जानें लूटा कितना जीवन

कितने ही आशियाने टूटते

घर घर होता क्रंदन


बारिश की बूंदें अंबर से निकलकर

धरती की गोद में समा जाती है

पर यह बिजली चमक कर

गरज कर लौट जाती है


इतने वेग से यूं चमकती

अपनी गर्जन से सहमा देती है

पुनः बरखा के रूप में यह

राहत बरसा जाती है



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