भूख और प्यास
भूख और प्यास
भूख और प्यास, रोटी की आश ।
लगी जोरों की भूख, तड़पाती प्यास ।
मांग रहा रूह रोटी ,कर रही भूख, भोजन की तलाश।
भूख मिटाने कोई फरिश्ता आ जाए आज काश!
सड़ रहा अन्न का ढेर उन खास आदमियों के रखा पास।
कैसे निष्ठुर बन गये हैं,मानो क्रूर निर्मम बन बैठी है सास।
जैसे- तैसे चल रही अब हमारी साँस।
भूख और प्यास रोटी की आश।
ढूंढ रही निगाहें कब मिलेगी रोटी ,कब मिटेगी प्यास।
शरीर भी अब थक हार गया,ऐसा प्रतीत हो रहा मानो जिंदा पड़ा हो लाश ।
हम आदमी किसी के थोड़े हैं ,कोई खास !
जो मदद के लिए आगे बढ़ाए कोई हमारे तरफ हाथ, दे अपना हाथ।
भूख और प्यास रोटी की आश।
परिश्रम ही एकमात्र इसका समाधान। ।
