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Sudhir Srivastava

Abstract Tragedy

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Sudhir Srivastava

Abstract Tragedy

भीष्म प्रतिज्ञा

भीष्म प्रतिज्ञा

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ये भीष्म प्रतिज्ञा जैसा ही तो लगता है

मिट्टी में मिला दूंगा संवाद

जैसे मां सरस्वती की इच्छा से ही निकला था।

फिर तो सब कुछ ठीक वैसे ही चल रहा है

जिसके लिए कहा गया

वो मिट्टी में मिलने लगा और मिलता ही जा रहा है

जिसे वो भी स्वीकार कर रहा है,

मिट्टी में तो मिल गया खुद बयान कर रहा है

उससे जुड़ा हर शख्स भी हलकान हो रहा है

उसके माफिया राज का तंबू उखड़ गया है

परिवार बिखर गया, उसके गुर्गों का हाल मत पूछो

बीबी, बेटा, बहन, बहनोई, कुछ रिश्तेदार भी

मुंह छिपाए भागे भागे फिर रहे हैं

या जेल की रोटियां तोड़ रहे हैं।

हालत ये है कि कल तक जिसकी तूती बोलती थी

शासन, सत्ता में भी जिसकी हनक थी

जिसके इर्द गिर्द जमघट होता था

जो जेल में भी रहकर अपराध की नींव रख देता था

यूं ही वो माफिया डॉन थोड़े ही कहलाता था

सब कुछ करीने से मनमर्जी से ही करवा लेता था।

जेल में भी उसका जलवा बरकरार था

वहां भी वो गिड़गिड़ाता नहीं, हुक्म चलाता था

अपहरण, हत्या कराता, रंगदारी मंगवा लेता था

जिसे चाहा पकड़वा लेता

जेल में बुलाकर पिटवा ही नहीं पीट भी देता था

जबरन किसी की भी संपत्ति

अपने या अपने बीबी बच्चों के नाम करवा लेता था।

जिसने उससे बैर ठाना, 

उसका काम तमाम करवा देता था,

कुछ सिरफिरे ही उससे बैर ठान पाते

बदले में मिला क्या बस अपनी जान ही गंवाए।

सौभाग्य से कुछ ही बच पाये।

मगर अब हालात एक दम उलट है

दबंग माफिया अपराधी धर धर कांप रहा है

उसे अब अपनी मौत का डर सता रहा है

मिट्टी में मिल गया वो खुद कह रहा है

अपराधी बीबी बच्चों के लिए रहम की भीख मांग रहा है

खुद भीगी बिल्ली बन गया है 

मिट्टी में मिलाने के बाद अब उसे रगड़ा जा रहा है

तभी तो ये बात खुद कह रहा है

अपने जुर्मों की ही तो कथा व्यथा मान रहा है

भीष्म प्रतिज्ञा के लिए उकसाने के लिए

नासमझ नेताजी को पानी पी पीकर कोस रहा है

जेल में रहना ही अपने लिए सबसे मुफीद माना रहा है,

मन ही मन ऊपर वाले का भी दोष दे रहा है

शातिर दिमाग का दिमाग नहीं काम कर रहा है

या कोई नई चाल चलने का माहौल बना रहा है

सबको गुमराह कर रहा है

क्योंकि उसके शातिर दिमाग का कीड़ा 

भला शांत कहां रहने वाला?

कुलबुलाते हुए बस मन मसोस कर अभी रह रहा है

काटने के सही समय का इंतजार कर रहा है

पर उसे भी पता है अब ये लगभग नामुमकिन है

पर वो ये मानने को तैयार नहीं है

सिर्फ गुमराह कर भोला बनने का नाटक कर रहा है।

एक जेल से दूसरी जेल यात्रा काफिले के साथ कर रहा है

अपनी हनक का अभी भी सबूत दे रहा है,

सरकारी धन को चूना लगवा रहा है,

अपना नाम का सिक्का चमका रहा है,

भीष्म प्रतिज्ञा की पूर्णता का इंतजार कर रहा है

और ऊपर वाले को याद कर रहा है

अपने एक एक जुर्म को गिन रहा है। 



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