बेचैन मन
बेचैन मन
दिलों के समंदर में जज्बात कुछ इस कदर हुए ख़फ़ा
भंँवरे ने छोड़ दिया यह सोच कौन सी है पहली दफ़ा
ख्यालों के परतों में खोया रहा वह रात भर
पलकों की अश्कों से नाम लिखता है उस चांँद पर
इश्क फ़िज़ाओं में बिखरने लगे चमन को है यह पता
कलियाँ घुंँघट हटाने लगी भँवरे की इसमें क्या ख़ता
भंँवरे को फूल पर गुनगुन करने में जो सुकून है
हर इश्क-ए-फूल पर मिलने का उसको जो जुनून है
पंचम कोयल कूक से फूल भी इतराने लगे
बेचैन मन भंँवरा भी प्रेम पुष्प से इश्क फरमाने लगे
सांँझ के पहर जब फूल अपनी ओट से मुरझा गए
प्रेम में तड़़प बेचैन भंँवरा अपने प्राण पखेरू उड़ा गए।
