बदलता नजरिया
बदलता नजरिया
बारहवीं पास कर ली थी।
आगे की पढ़ाई के लिए,
विषय का चयन करना था।
भीड़ से अलग कुछ बनना था।
पहले कामर्स पढ़ने का निर्णय था।बाद में लाॅ के एंट्रेस में पास हो,
जब काॅलेज में एडमिशन लिया,
तब सबने इसे एक बेवकूफी समझा।
उसे बुद्धिहीन समझा।
किंतु काॅलेज के पांचवे साल के खत्म होने के पहले ही जब,
मुबंई में एक नामी कंपनी में बढ़िया पैकेज मिला
।तब सबने उसकी पीठ ठोकी ,
और सबको अपनी गलती समझ आई।
आज दस सालों में नामी कंपनी में ,
मेहनत की ओर अग्रसर है ।
निरंतर उन्नति के पथ पर है।
जी एम लाॅ के पद पर।
अब वो सब लोग ही सैलरी के जंप की चर्चा करते हैं।
कुछ न बनने और बहुत कुछ बन जानेके बीच बदलता नजरिया होता है।
अमृता शुक्ला
