गुलदस्ता
गुलदस्ता
-नन्हें बच्चो तुम्हें पालना है
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पता नहीं,
मन क्या चाहता है?
शोर से बेचैन होता ,
अकेलेपन से घबराता है।
तुम्हारा हूं सदा ये जताता है।
फिर कहीं गुम हो जाता है।
ढूंढती हूं जो कहीं उसे,
यादों के अबांर में नज़र आता है।
नियति होती है मिलना बिछड़ना,
कुछ देर में मुझसे मिल पाता है।
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
4_तुमसे दुनिया है मेरी तुमसे आंखों में सपने
कोई साथ रहे न रहे तुम सदा रहना अपने
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
5_सामने तुम्हारा चेहरा है हमारे बीच मौन पसरा है
जाने कितनी देर से ऐसे ही बिना संवाद के वक्त ठहरा है।
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
9_बचपन से शुरू हुआ था एक सफर।
जवानी आई सवार होकर सपनों पर।
बुढापे की निशानियाँ उभर गई अब तो,
आईना बताता ,कैसे बीती इतनी उमर
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
10_उम्र बढ़ती जाती है ,नींद घटती है,
फिर जीने की चाहत सिमटती है।
नज़र धुँधला रही,सांस कुम्हला रही,
ज॔रा सी आहट, हो तो खटकती है।
आज में जीते कल की चिंता बनी
अतीत की यादें पास में भटकती हैं।
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
11_-क्या मांगें हम प्रभु तुमसे।
12_प्यार बांटकर ही प्यार निभाना है।
आंखों से आंसुओं.को हटाना है।
दूर हो जाओ तो याद आते रहो
भूल जाने का नहीं ज़माना है।
कब तक दिल में बात रख्खोगे।
किसी से तो सच बताना है।
इस तरह तन्हा मत फिरा करो
ढूंढ लो मिल जाए जो ठिकाना है।
लोग अपनी अपनी तरह सोचेंगे
यह हकीकत है या ये फ़साना है।
डॉअमृता शुक्ला
रायपुर छत्तीसगढ
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प्रेम और विश्वास नींव में,मर्यादा की हो दीवार,
आदर्शों की छत के नीचे झेल सके जीवन के वार।
सच्चाई की सरगम पर,अपनेपन का गीत बजे,
निष्ठावान रहे जीवन में,दुल्हन जैसी प्रीत सजे।
शक का द्वार बंद रहने दें,सबको मन की कहने दें,
जब तक सीमा के अंदर हो,थोडी़ मन की करने दें।
केवल रिश्ता ही जुड जाना,है घर की आधार नहीं,
बनता मकान ईंट गारे से,होता घर का निर्माण नहीं।
घर मकान का फर्क जानना वालों का संसार हुआ,
वही हुआ सार्थक समर्थ जिसका सच्चा घर-द्वार हुआ।
डॉअमृता शुक्ला
