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Mukesh Bissa

Abstract

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Mukesh Bissa

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बदला सा आदमी

बदला सा आदमी

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अपनों की इस बस्ती में बेगाना सा आदमी

हर पल हर रोज धोखा खाता आदमी


दो पाटों के बीच मे फंसा हुआ आदमी

हर बार उनसे कितने वार झेलता आदमी।


अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाता आदमी

हार कर भी जीत को कोशिश करता आदमी।


दुसरों के लिए असूलों की कब्र खोदता आदमी

ढूँढते हुए सच की राह में जुठ पाता आदमी।


अनवरत अविरल सा चलता जा रहा आदमी

इस शहर की भीड़ में पाया नही अदद आदमी।


जीवन की आपाधापी में लिप्त है आदमी

अंतहीन यात्रा में चलता जा रहा है आदमी।


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