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PANKAJ GUPTA

Abstract

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PANKAJ GUPTA

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अतर

अतर

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तेरी अतर

लिपटी है मेरी देह से

मानो स्प्रिट मेरे घावों

को धो रही

याद दिला रही तेरी कहानी को

जो तलाश में है अपने शीर्षक की

मेरे जिल्द पर....।


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