अर्थ ही अनर्थ, भाषा के विकृति: एक भाषा सर्वोपरी नहीं
अर्थ ही अनर्थ, भाषा के विकृति: एक भाषा सर्वोपरी नहीं
भाषा सभी के साथ साझा करने के लिए विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है,
लिपि बनाने के लिए लिपि के माध्यम से बोली जाने वाली भाषा लिखी जाती है।
हर समय पढ़ने के लिए किताबों के रूप में निश्चित रूप से,
इस तरह दुनिया में भाषा साहित्य का विकास होता है!
जैसे अच्छी तरह से विकसित भाषा में पारंगत होने के बाद,
अंग्रेजी हो या तमिल या कोई दूसरा भाषा, यह लिपि को एक अजीब रूप देता है।
इस लिए उस भाषा की लिपि बनाने के लिए विकसित किया जा रहा है
उस भाषा में साहित्य विकसित करने के लिए पुस्तकों का प्रकाशन होता हैं।
एक पुरानी भाषा जिसे सैकड़ों वर्षों से परवाह नहीं है, निश्चित रूप से बहुत कम है।
विश्व की विकसित भाषाओं की तरह विकास का मौका,
जहां तक लुक, स्टाइल और सुविधा में लिपि की बात है,
दुनिया की विकसित भाषाओं की तरह आसानी से और तेजी से लिखने के लिए!
कौन बता सकता है कि कितनी भाषाएं हैं? अनेकता में एकता क्या है?
केवल एक भाषा का सम्मान नहीं करने के लिए?
यह मानसिकता की नीचता को दर्शाता है।
अर्थ और अनर्थ पर्यायवाची हैं, जैसे प्रकाश या अंधकार, और काला और सफेद।
ये शब्द ब्रह्मांड के चारों ओर घूम रहे हैं, हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
मैं कविता में तुक-बंदी योजना में विश्वास नहीं करता,
जब हमारे जीवन में कोई मिलन नहीं है कभी सुख तो कभी दुख का योजोना।
जीवन सूखा और छंद हीन है। फिर क्यों हम जबरदस्ती तुक-बंदी लाने की कोशिश करते हैं।
क्या छंद जरूरी हैं कविता में।।
व्याकरण क्या है? ब्रह्मांड में व्याकरण कितने प्रकार के होते हैं?
सौंदर्य पारलौकिकता से अलग है, क्या यह सभी को मालूम है?
ब्रह्मांड में कितनी भाषाएं हैं? क्या उन सभी भाषाओं को बताने वाला कोई है।
फिर एक भाषा पर अभिमान क्यों है।
रस और अलंकार क्या है? अगर कोई अलंकार को नहीं समझ सकता है तो कविता का क्या अर्थ है?
क्या यह कवि का दायित्व है कि वह अपनी भाषा को सहज करे
या अभिमानी पाठकों का कर्तव्य है कि वह कविता के आंतरिक सार को प्रकट करे।
संस्कृत और पाली की उचित शिक्षा किसके पास है? फिर किसी भाषा विशेष का अभिमान क्यों?
भगवान देहात बनाए और मनुष्य सहर बनाए।
इसी तरह हमने अपनी मर्जी के लिए भाषा बनाई।
खुद का मनोविज्ञान, खुद की मानसिकता को ठीक से सीखें; विभिन्न लोग विभिन्न भाषाएं हैं;
विभिन्न दिमाग बुद्धि के साथ। यदि हम अपनी चतुर बुद्धि को नहीं बदल सकते हैं
तो अनेकता में एकता में कोई फलदायी नहीं है।
मातृभाषा हमें बाधा डालते हैं दूसरे भाषा के उपर लिखने में, क्या भाषा तत्व हमें ये नहीं सिखाया।
चलो ज्ञान के पीछे भागते हैं, विचारो के पीछे नहीं।।
