अपनी तलाश
अपनी तलाश
मैं अपनी तलाश कर रहा हूँ
ख़्वाबों में स्याही भर रहा हूँ
आँखों में छाया घना अंधेरा है
अंधेरे में खुद को देख रहा हूँ
मैं अपनी तलाश कर रहा हूँ
मेरी आँखों पर पट्टी पड़ी है,
ख़ुदा की नज़रों से देख रहा हूँ
मैं बहुत होशियार बन रहा हूँ
ख़ुदा को बेवकूफ़ समझ रहा हूँ
बचपन नादानी में बीत गया था
जवानी में ये दिल जीत गया था
अब बुढ़ापे में आकर रो रहा हूँ
मैं अपनी तलाश कर रहा हूँ
ख़ुदा से मिलने को अब तरस रहा हूँ
न जाने कितने जन्मों से भटक रहा हूँ
अब भी वक्त है संभल जा, साखी
बाहर नहीं अंदर ही पहचान
मृग कस्तूरी को अंदर ही जान
सरल मन से अब उसे रिझा रहा हूँ
मैं अपनी तलाश खत्म कर रहा हूँ
वो मेरे पास है,
दे रहा सांसो का हर पल ग्रास है
उसकी इबादत सांसों से कर रहा हूँ
आनंद आता है, इतना
जितना दरिया में पानी नहीं
बस ख़ुदा तेरी बंदगी के लिए
इस शरीर को जिंदा रख रहा हूँ
मैं अपनी तलाश खत्म कर रहा हूँ
