अपने मन की....!
अपने मन की....!
याद है तुम्हें...!
तुम अक्सर कहती थी
तुम्हें उड़ना है
खुले नीले ऊंचे
आसमान में बादलों के पार
जहां जाने की तुम्हारी जिद्द थी..........
तुम बहना चाहती थी
कल कल बहती नदियों के संग
दूर तक अपने मूल से.........
तुम थाह लेना चाहती थी
गहरे समुद्र की
अनंत गहराई को........
तुम्हारी ख्वाहिशों में
प्रकृति के कण कण में
घुलना था
रच बसना था..........
तुम मंत्र मुग्ध हो जाती
कहीं सुध खो देती
जब कोहरे में लिपटे
ऊंचे बर्फीले
पहाड़ों को देखती......
तुम घुलने लगती
छुईमुई सी सिमटने लगती
ओस की बूंदों के संग
अक्सर.....
तुम मिलना चाहती थी
उस मिट्टी में
जो कुम्हार के घड़े में लगती है
और अपनी खुशबु से
सबका दिल जीत लेती है.....
तुम्हें बहुत भाती थी
रंग बिरंगी रंगीन
नन्हे पंखों वाली तितलियां
जिनके संग तुम
अक्सर मंडराया करती थी
बाग बगीचों में.......
तुम अक्सर खामोश रहती
जब सूरज
शाम की बेला में
पहाड़ों में अस्त हो रहा होता........
तुम्हारा मन
बेशक शांत चित्त रहता
पर तुम्हारे अंदर के
उथल पुथल को
मैंने बहुत करीब से महसूस किया.....
तुम लौट जाना चाहती थी
फिर से अपने
निश्चल बचपन में
जहां न कोई पीड़ा थी
ना कोई भविष्य की चिंता.....
और तुमने सब छोड़
अलविदा कहने का मन बनाया
खुद से दूर जाने का मन बनाया.....
और पा ली अपनी
तमाम ख्वाहिशों
तमाम पीड़ाओं से मुक्ति......!!!
तुमने वही किया
जो तुम अक्सर करती थी
सिर्फ "अपने मन "की....!!!!
