अंतर्द्वंद...
अंतर्द्वंद...
एकाकीपन की ऊँगली थामे,
विस्मित आज ताकती हूँ फिर
एक असीम सन्नाटे की ओर
व्यथित सी निकलती हूँ फिर।
नहीं ज्ञात किधर है जाना
हर मंजर हर पथ अनजाना
भ्रमित सी हो मोह भंग होने पर
आँखें मूँद सिसकती हूँ फिर ।
पीछे मुड़ कर क्या पाना है
यादों का एक ताना बाना है
पत्थर बनकर सोंचू एक क्षण
भावुक हो पिघलती हूँ फिर।
यद्यपि जीवन मोह मात्र है
आत्मयिता का रिक्त पात्र है
अब जीवन किस रूप ढलेगा
उसी रूप मे ढलती हूँ फिर।
छलना मेरी आशाओं का
दोष नहीं है शंकाओं का
शंका और विश्वास को मथ कर
खुद ही खुद को छलती हूँ फिर।
पर हृदय नहीं मेरा निराश
कभी तो विजयी होगा विश्वास
अभिनव दिन के पंखो को छू
उसी खोज पर चलती हूँ फिर…
