याद तुम आती हो माँ ...
याद तुम आती हो माँ ...
जब थक कर दिन भर की आपाधापी से
घर आती हूँ गुमसुम अलसायी सी
जब उलझनों से कड़वा मन सुनना चाहता है
हंसी कोई मिठाई सी
तो याद तुम आती हो माँ ....
जब नींद से ज्यादा आँखों को
उलझनें डबडबाती हैं
जब घड़ी को तकते तकते रातें गुज़र जाती हैं
जब चाहता है टूटा थका तनमन
लोरी कोई दवाई सी
तो याद तुम आती हो माँ ....
जब रोज़ की सैंडविच कॉफ़ी से
मन उकता सा जाता है
जब किसी और के डब्बे में
घरवाला अचार महकता है
जब भरा पेट भी ललचाता है
खाने को मक्खन मलाई सी
तो याद तुम आती हो माँ ....
जब कुछ ना अच्छा लगता है
कोई ना सच्चा लगता है
जब भीड़ में भी खुद को ये मन
एकाकी सा पाता है
सर्दी की गर्म रज़ाई सी
याद तुम आती हो माँ ....
याद तुम आती हो माँ ....
