STORYMIRROR

Krishna singh Rajput sanawad

Romance

3  

Krishna singh Rajput sanawad

Romance

अनकही बातें

अनकही बातें

1 min
305

वह भी क्या घड़ी थी

जब तू मेरे पास खड़ी थी

वह भी क्या घड़ी थी 

जब तू मेरे पास खड़ी थी।


गम कोसों दूर नजर नहीं आ रहे थे 

खुशियों के मानो लग गई लग गई झड़ी थी।

वो क्या घड़ी थी

जब तुम मेरे पास खड़ी थी।


शायद मांगी थी मैंने

मन्नत खुदा से बरसों पहले

आज हो गई वह पूरी

अब तक जो अड़ी थी।


वो भी क्या घड़ी थी

जब तू मेरे पास खड़ी थी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance