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Ratna Kaul Bhardwaj

Inspirational

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Ratna Kaul Bhardwaj

Inspirational

अनिंद्रा से जब जाग उठा

अनिंद्रा से जब जाग उठा

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अनिंद्रा का कोहराम

मस्तिष्क में काले बवंडरों का डेरा

मखमली बिस्तर में भी

एहसास चुभते कांटों का

धुआं धुआं सा, जला - जला सा

क्यों लगता यह सारा जहां?


बे सुध तन और विचिलित मन

भीतर बेकरारी अन्नत

मुख पर आनंद और उल्हास

मन की तड़प को सहमते सहलाते

यह प्रचंड जीवन क्यों है

दौड़ - धूप से भरा भरा?


अंतर्द्वंद की प्रचण्ड पुकार

कभी इंकार, कभी इकरार

कभी ज्वाला, कभी बेचैनी

कौन सुने अंदर की हाहाकार

जीवनरूपी समुद्र का

कोई बताए है कहां किनारा?


ब्रह्माण्ड को भी ललकारते

मस्तिष्कों के है झुंड भरे

अपनी ही चाल से चलते हुए

न जाने किस जतन में फंसे है सारे

सच्चाई की है बस लीपा - पोती

ज्ञान बदल रहा क्यों अपनी परिभाषा?


मन कुछ घबराया सा

शीशे के सामने खड़ा हुआ

भीतर कुछ लगा खोजने

कोई अदृक्ष शक्ति बोल पड़ी

क्या सोच रहे हो, क्या खोज रहे हो

क्यों चेहरे पर है विलीनता

और अंदर से क्यों है डरा - डरा?


अपने अस्तित्व से मिल जरा

वार्तालाप का ढूंढ विकल्प नया

सच्चाई का कर खुल कर सामना

धूल मिट्टी आंखों से हटा जरा

मत भटक इधर - उधर

भीतर ही है तेरी नया का खिवैया


संतुलित रख विचारों को

चरित्र की भी डोर संभाल

चला दे अपनी बुद्धि का तीर

चीर दे इन काले सायों को

अविश्वास को दूर भगा

विफलताओं से मत गबरा


मैं भोंचकी सी रह गई

सिर खुजलाते सोचने लगी

अपने भीतर को बिन पहचाने

क्यों दोष हम बाहर डूंडे

आज अस्तित्व मेरा समझ में आया

मेरा मन ही है मेरी प्रेरणा


संकल्प आज मैंने लिया

जीवन को संवारने का

दायत्व सिर्फ औरों का ही नही

दायत्व है मेरा भी

अनिंद्रा से गर है दामन छुड़ाना

बस मन मस्तिकक्ष को है वश में करना......



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