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Abhishek Singh

Tragedy

3  

Abhishek Singh

Tragedy

अक्सर!

अक्सर!

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दिल ने ढूंढा कई बार

होने का उनके एहसास

भटकता रहा दर-बदर

मिली कहीं न इधर उधर


स्वप्न टूटा तो ज्ञात हुआ

राहें बिछड़ गई एक मोड़ पे

न प्यार घटा और दर्द बढ़ा

एक रास्ता जुड़ा जिस मोड़ पे


बिन सावन के भीगे हम

बसंत ने ली अंगड़ाई

पतझड़ का मौसम आया

छूट गई परछाई


दिल ढूंढने लगा फिर एक बार

आंखें बंद की जितनी बार


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