STORYMIRROR

Preeti Sharma "ASEEM"

Tragedy

4  

Preeti Sharma "ASEEM"

Tragedy

अजनबी

अजनबी

1 min
302

वो अजनबी हो कर भी पहचान बन गया था।

ना जाने कब धड़कन से जान बन गया था।


ना चैन आता था करार बन गया था।

देखते ही देखते बेचैन कर गया था।


वो अजनबी हो कर भी पहचान बन गया था।

ना जाने कब धड़कन से जान बन गया था।


दिल में एक हूक वो उठा कर गया था।

आखिरी बार मिल के फिर ना मिला था।


कहाँ उस को ढूंढूं वो कहां गया था।

मर कर जो मुझको ही मार गया था।


दिल के इन सौदों में कुछ ना मिला था।

वो अजनबी दिल दे के जान ले गया था।


इंतजार करते रहे हम जब से वो गया था।

हमारे हाल का भी उसको क्या पता था।


वो अजनबी हो कर भी पहचान बन गया था।

ना जाने कब धड़कन से जान बन गया था।


प्यार में सजा हमारे नाम जो कर गया था।

सात जन्मो के अपने वायदे से भी मुकर गया था।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy