ऐ स्याह रात
ऐ स्याह रात
स्याह रात और तुम्हारी याद
दोनों मिलकर कर देते है मेरे कुछ यूँ हालात,
ना सो पाती ना जग पाती
यादों में तेरी खो जाती।
आँखों से बहते आँसू हैं
खुलती तेरी हर पाती हैं
जिनको पढ़कर मुस्काती हूँ
गालों पर आती लाली है।
याद आतीं हैं सारी बातें
जब बातों में कटती थी रातें।
वो दिन भी थे जब साथ चले
हाथों में लेकर हाथ चले ,
अब बातें हैं बस बातें हैं
ये स्याह अंधेरी रातें हैं।
अब तुम कभी नहीं आओगे
आकर ना मुझे मनाओगे ।
चले गए तो कोई बात नहीं
इतना रहम तो कर जाते
ले जाते अपनी यादों को
कम से कम रातों का सुकून दे जाते।

