युद्ध और शांति
युद्ध और शांति
कहते हैं युद्धसरहदों पर लड़े जाते हैं,पर सबसे लंबे युद्धअक्सर एक ही छत के नीचे होते हैं।
जहाँ पतिअपने तर्कों की तलवार लिए खड़ा होता है,और पत्नीअपनी चुप्पियों की ढाल ओढ़ लेती है।
शब्दों के बाण चलते हैं,अहंकार के घोड़े दौड़ते हैं,जीतने की ज़िद मेंदोनों हारते रहते हैं।
फिर एक दिन...रसोई में रखी ठंडी चाय,दरवाज़े पर बिना कहे किया गया इंतज़ार,या थाली में चुपचाप परोसी गई आख़िरी रोटी—इतिहास की सबसे बड़ी संधियाँइन्हीं छोटी-छोटी बातों से लिखी जाती हैं।
तब समझ आता है—
घरों में रहने वाले लोगदुश्मन नहीं होते,बस कभी-कभीअपनी-अपनी चोटों के सैनिक बन जाते हैं।
इसलिएपति और पत्नी का रिश्तायुद्ध जीतने का नहीं,हर रोज़ अपने भीतर के अहंकार को हराकरशांति को घर लौटाने का नाम है।
क्योंकि...
जहाँ प्रेम जीवित रहता है,वहाँ कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ एक घर बचा रह जाता है।

