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Kanchan Prabha

Abstract


4.5  

Kanchan Prabha

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अगर ख्वाब ना होते

अगर ख्वाब ना होते

1 min 229 1 min 229

अम्बर के तारों में टिमटिमाहट न होती

चंदा की चन्दिनी में चमचमाहट न होती

सुर्य की तपन में गरमाहट न होती

जगती हुई आँखो में अगर ख्वाब न होते


ठंढी सी ब्यार में इठलाहट न होती

मेघ के धड़कन में गड़गड़ाहट न होती

वारिश की बूंदों में झमझमाहट न होते

जगती हुई आँखों में अगर ख्वाब न होते


चिड़ियों की बोली में चहचहाहट न होती

पेड़ों के पत्तों में सरसराहट न होती

फूलों के कली में  खिलखिलाहट न होती

जगती हुई आँखों में अगर ख्वाब न होते


भवरों की गुंजन में भनभनाहट न होती

बच्चों के चेहरे की मुस्कुराहट न होती

राही के गीतों में गुनगुनाहट न होती

जगती हुई आँखों में अगर ख्वाब न होते


दुल्हन के घूँघट में शरमाहट न होती

गाँव की गोरी में छमछ्माहट न होती

प्रणय हृदय में प्रेम की आहट न होती  

जगती हुई आँखों में अगर ख्वाब न होते।



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