अधिकारों की मशाल
अधिकारों की मशाल
"अधिकारों की मशाल – डॉ. भीमराव अंबेडकर"
जन्मा एक दीप अंधेरों में,
जो जला ज्ञान के घेरों में।
छूआछूत के बंधन तोड़े,
न्याय के स्वर को ऊँचा जो बोले।
ग़रीबी में जन्मा पर हौसले अमीर थे,
मन में विद्रोह, आँखों में सपने गंभीर थे।
कहा – “शिक्षा है शस्त्र हमारा”,
बन गया वो युगों का सहारा।
छोटी जाति कहा गया,
पर हिम्मत नहीं छोटी थी,
हर पग पर काँटे थे,
पर चाल बहुत मोटी थी।
पढ़ा विदेशों में, पाया ज्ञान महान,
लौटा भारत,
बना संविधान का शिल्पकार महान।
क़लम थी उसकी तलवार सी,
हर शब्द जैसे अंगार सी।
उसने लिखा वो ग्रंथ नया,
जिसमें हर नागरिक का सपना सजा।
न्याय, स्वतंत्रता और समानता की पुकार,
बाबा साहब ने दी संविधान से उपहार।
न दिये उसने ख़ाली नारे,
दिये हक़ दिल से, पूरे इरादे हमारे।
“शिक्षित बनो, संगठित रहो,
संघर्ष करो,”
हर शब्द जैसे अग्नि की लहर हो।
उसकी सीख है आज भी ज़िंदा,
हर युग में वो एक परिंदा।
जिसने उड़ा आसमानों को छूकर,
हर दीवार को गिराया झुंझला कर।
उसने कहा – “मुझे एक धर्म दो,
जो मानवता के मूल में हो।”
बौद्ध बना, बुद्ध का मार्ग अपनाया,
मनु के विधान को ललकार सुनाया।
सदियों की चुप्पी तोड़ दी उसने,
हर दलित को आवाज़ दी उसने।
आज जब उसकी जयंती आए,
हर दिल से एक ही स्वर गूंज जाए –
"जय भीम! जय संविधान!
तेरे सपनों को दें अंजाम।"
