अबला नहीं सबला है नारी
अबला नहीं सबला है नारी
आज की नारी
अब सब पर भारी॥
जो थी कभी घर-घर की नौकरानी,
जो थी कभी खुद लाचारी,
आज है संपूर्ण जगत की वो अधिकारी॥
पहले दबी थी एक चिंगारी,
अब वही नारी हुई है सब पर भारी॥
लेकर कंधों पर सबकी ज़िम्मेदारी,
करी थी उसने कुछ ऐसी तैयारी,
अपने अधिकारों को पाने के लिए
बनी वो अब वो क्रांतिकारी॥
तू जननी, तू उपकारी,
हे! ज्ञान प्रसारिणी तू ही जग की
सृजनकारी॥
नभ की ऊँचाई को छूती, तू ही
गगन-विहारी।
अन्याय के आगे अब न झुकने
वाली नारी॥
