अभिमन्यु
अभिमन्यु
था विराट क्षेत्र बन्ना वो,
रणबांकुरे भर रहे हुंकार थे ,
हर और गूंज रहे थे शूरवीर ,
धरे इन सबके बीच माधव तब भी थे धीर ।
योद्धाओं से भारी वह भूमि प्रतिक्षण कर रही थी मृत्यु तांडव,
सौ कौरवों के समक्ष खड़े थे पांच पांडव।
युद्ध वह केवल भाई का भाई से नहीं था,
युद्ध वह सत्य का सत्ता से था ,
18 दिन चला वह इतिहास का सबसे लंबा युद्ध था
प्रतिदिन चले नरसंहार में प्रतिक्षण कोई खो रहा अपने प्राण था।
था गहन शोक का दिन तेरहवां वह
जब बालक अभिमन्यु घिर चुका चक्रव्यूह में था
सप्त महारथी जो थे अत्यंत महाबली
टूट पड़े नन्हे बालक पर
रणभूमि के सभी नियमों को लांघकर।
लड़ा अत्यंत साहस से शूरवीर बालक वह,
झोंककर अपनी समस्त ताकत वह
जानकर कि युद्ध होगा अंतिम वह,
तब भी अपनी समस्त ताकत से लड़ा नन्हा बालक वह।
पिता की हिम्मत जो टूटी थी युद्ध के पहले ही
उसे हौसला देने आवश्यकता पड़ी थी स्वयं माधव की
किंतु कर्तव्य के पथ पर, निःस्वार्थ ही चल पड़ा बालक वह।
अर्जुन को फिर भी श्री कृष्ण का साथ था
किंतु अभिमन्यु के भीतर बस स्वयं का अदम्य साहस था।
अपनी अंतिम सांस तक लड़ा शूरवीर वह,
कहलाया अर्जुन से भी महान योद्धा व आदर्श पुत्र वह।
