STORYMIRROR

Subhadeep Chattapadhay

Abstract

4  

Subhadeep Chattapadhay

Abstract

सूर्य से उधारी

सूर्य से उधारी

1 min
239

मुझे सब कुछ शांत करने की कला सीखनी है 

जो संध्या से पूर्व सूरज के किरणों में होती है

मुझे वो सीखनी है, लेनी है

उधारी चली तो ठीक

नहीं तो नगद देने को भी तैयार हूँ।


मुझे बस वो कला सीखनी है

जो सूरज को अपने 

अंतिम क्षणों में न जाने कहाँ से मिल जाती है 

क्योंकि अंत तो यहाँ सब हुए पड़े है।


तो सिर्फ उसे ही ये खुशकिस्मती क्यों ?

जलता तो वो भी है, जलते तो हम भी है 

हाँ, एक फर्क तो है

वो जलता दूसरों के लिए

हम जलते दूसरों से है।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract