STORYMIRROR

himani goel

Tragedy

3  

himani goel

Tragedy

अब साँसे घुटने लगी

अब साँसे घुटने लगी

1 min
229

हुआ है क्या ये शहर को मेरे

क्यों साँसे अब घुटने लगी

क्यों मजबूर हर कोई हो गया

क्यों बस अब ज़िन्दगी मोहलतो में बसरने लगी

पानी को अकेले बिकता देख

मजबूरन अब हवा भी बिकने लगी

दिल वालों की नगरी मैं

इंसानियत की कमी सी खली

देखा मैंने अपने शहर को

पल पल मरते हुए

देखा मैंने एक माँ को अपने बच्चे से बिछड़ते हुए

कहीं ईमान बिकता दिखा

कहीं इंसान बिकता दिखा

एक एक सांस के लिए

घर घरौंदा बिकता दिखा

कोई दुआ मांगता रहम की

कोई ज़िन्दगी की भीख मांगता दिखा

कहाँ लाकर खड़ा कर दिया मेरे खुदा

इंसान इंसान के करीब जाने से डर रहा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy