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सुनील त्रिपाठी

Romance

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सुनील त्रिपाठी

Romance

आवरण मुख से अपने हटा लो प्रिये

आवरण मुख से अपने हटा लो प्रिये

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आवरण मुख से' अपने हटालो प्रिये, मैं निरख रुप, तृष्णा बुझाता रहूँ । 

तुम लजाती रहो देख सम्मुख मुझे,मैं नयन बाण तुम पर चलाता रहूँ ।


मैंने' स्वप्नों मे' रातों निहारा जिसे, तुम वही मेरे' स्वप्नों की' परिकल्पना ।

याद लेकर तुम्हारी मैं जागूँ सुबह, स्वप्न साकार दिन भर बनाता रहूँ ।


कामना हो तुम्हीं याचना हो तुम्हीं, हो तुम्हीं प्रार्थना,भक्ति,आराधना ।

मूर्ति मन्दिर में' मन के तुम्हारी बिठा,प्रेम की देवि तुमको' बताता रहूँ।


भाग्य भी तुम मे'रा और सौभाग्य भी, भोग भी तुम्हीं और वैराग्य भी। 

चाह पाने की' तुमको हृदय में लिए,धूनि दर पर तुम्हारे रमाता रहूँ ।


दिन लगे होलिका रात दीपावली, सँग तुम्हारे लगें पर्व आठो पहर ।

काश मिल जाओ तुम उम्र भर लिए, पर्व सँग सँग मैं' हर दिन मनाता रहूँ ।



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