STORYMIRROR

Maan Singh Suthar

Inspirational

4  

Maan Singh Suthar

Inspirational

आत्मसम्मान

आत्मसम्मान

1 min
346

शिशुपाल ने भरी सभा में 

श्रीकृष्ण के आत्मसम्मान को जब ठेस पहुंचाई थी

सौ गलतियां माफ़ करने की 

सौगंध थी और एक ग़लती ने फिर शीश ने धरा पाई थी 

संयम की प्रकाष्ठा जब पार हुई , 

कौरवों की भरी सभा में ‌फिर‌ श्रीकृष्ण ने

विराट रूप धारण कर , 

सब अज्ञानीयों को अपनी महता समझाई थी। 

न माना दुर्योधन कुल के नाश को तत्पर

खाली हाथ लौटाया श्रीकृष्ण को , उसकी मति मारी गई थी। 

याज्ञसेनी के खुले केश और भीम की सौगंध

धृतराष्ट्र की अंधता में भीष्म की दूरदर्शिता भी हार गई थी। 

संधि के हर प्रयास विफल हुए , अंहकार भारी था

आख़िरी कोशिश में कुंती भिक्षा मांगने कर्ण के पास गई थी। 

पांच पांडव जीवित रहेंगे , मैं या अर्जुन एक मरेगा

कवच कुंडल गंवा चुका हूं , मेरे भाग्य में मृत्यु ऐसे ही लिखी गई थी। 

कर्ण ने भी मित्रता और आत्मसम्मान के लिए 

सब सत्य जान कर भी अपनी गर्दन कटाई थी। 

आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ नहीं सब गौण हो जाता है

जैसे इन्द्र के छल से सती अहिल्या पाषाण हो गई थी। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational