STORYMIRROR

गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract Inspirational

4  

गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract Inspirational

आल्हा /वीर छंद...

आल्हा /वीर छंद...

1 min
229

खप्पर वाली जय हो कालीकाशी हे मॉं दो वरदान।

डर-डर कर अब मरना कब तकजय करुॅं या करुॅं शीश प्रदान।।


मेरा रण हर क्षण कण-कण मेंकिंचित होगा आज महान।

धू-धू कर मैं ही दहकूॅंगाजल कर होगा शुद्ध मसान।।


 हे कौमारी हे कामाख्यादे दो कर में वह शमशीर।

 जब-जब काटे सर पापी काजयकार करे सिय का वीर।।


 हे कल्पलता हे कुमुदा अबतजुॅं चाहे मेवा या खीर।

 हे कठिना वर दो कार्यकरीकि करो माया हर बल बीर।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract