आल्हा /वीर छंद...
आल्हा /वीर छंद...
खप्पर वाली जय हो कालीकाशी हे मॉं दो वरदान।
डर-डर कर अब मरना कब तकजय करुॅं या करुॅं शीश प्रदान।।
मेरा रण हर क्षण कण-कण मेंकिंचित होगा आज महान।
धू-धू कर मैं ही दहकूॅंगाजल कर होगा शुद्ध मसान।।
हे कौमारी हे कामाख्यादे दो कर में वह शमशीर।
जब-जब काटे सर पापी काजयकार करे सिय का वीर।।
हे कल्पलता हे कुमुदा अबतजुॅं चाहे मेवा या खीर।
हे कठिना वर दो कार्यकरीकि करो माया हर बल बीर।।
