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Geeta Upadhyay

Abstract

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Geeta Upadhyay

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आईना भी मचल जाए

आईना भी मचल जाए

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शरारती आंखों की शरारत कहीं ना जाए

चेहरे की मुस्कान सैकड़ों बिजलियां गिराए

लिबास देखकर उसके


जमाना भी ठहर जाए

चुनरी टीका कंगन बालियां साथ

लंबी सी चोटी कहर ढाए


चंपा की कली हीरों सी जड़ी नजर आए

हवाओं को कैद करके केशो में

चेहरे पर वो जुल्फ अपनी लहराए

खूबसूरती पर अप्सराएं भी जल जाएं 


संवरती देखकर उसको

 आईना भी मचल जाए।


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