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V. Aaradhyaa

Romance

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V. Aaradhyaa

Romance

आए हैं आज पाहुना मेरे

आए हैं आज पाहुना मेरे

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आज रूपहला निकला चाँद मेरे ओसारे ,

घर आए हैं मेरे पहुना और सोलह श्रृंगार मेरे !


 नभ का गर्विला चाँद भी पड़ गया धुंधला सा ,

जब मेरे पार्श्व में आकर खड़े हो गए भरतार मेरे 


सज- धज कर जब हम आए उनके समक्ष ,

सौभागी जैसे शुभ पैर पड़े ना अब धरा पर मेरे !


मेरे लिए पर पुरुष उनके सामने फीके हैं सारे ,

रूप निखरकर चमक उठा सजना चाँद सा मेरे।


करवाचौथ जिन्हें लगता है मिथ्या आडंबर सा ,

उन्होंने प्रेम गली का दीदार ना किया होगा जैसे मेरे !


मन में है सदा समाई पिय की भोली भाली मूरत ,

निःसंकोच होकर कह दिये आज मैंने सारे विचार मेरे !



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