आदत सी है
आदत सी है
याद रखने को तो गमों का समंदर है मेरे पास
पर क्या करूँ मुझे भूल जाने की आदत सी है।
ठहर जाने को तो सौ वजह है मेरे पास
पर क्या करूँ मुझे चलते जाने की आदत सी है।
बोलने को तो बहुत कुछ है मेरे पास
पर क्या करूँ मुझे चुप हो जाने की आदत सी है।
कहने को तो बहुत से हक़ हैं मेरे पास
पर क्या करूँ मुझे हक़ ना जताने की आदत सी है।
सब कुछ तबाह करने की ताकत है मेरे पास
पर क्या करूँ मुझे सिर्फ बनाने की आदत सी है।
अपनाने को तो मुझे हर एक ने अपना लिया
पर क्या करूँ मुझे अजनबी रहने की आदत सी है।
जानने को को तो बहुत कुछ जानता है ये दिल
पर क्या करूँ मुझे अनजान बने रहने की आदत सी है।
