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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

आदमी की बेबसी

आदमी की बेबसी

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आदमी कितना बेबस हो जाता है 

जब वो साठ वर्ष का हो जाता है

ऊपर से बंद हो गर उसकी पेंशन, 

बेटों का ही वो नौकर हो जाता है


कैसे सँस्कार आ गए हम लोगों में

आंखें ही सूख गई अब तो रोने में

आदमी कितना बेबस हो जाता है

जब वो साठ वर्ष का हो जाता है


स्त्री तो वृद्ध होकर भी जी लेती है, 

अपने आंसू छिप-छिप पी लेती है

उससे बहु का कुछ काम हो जाता है

पिता उनके लिये बोझ हो जाता है


क्योंकि पिता की सारी जायदाद का, 

मालिक जो साखी वो हो जाता है

बेटों के आगे वो भिखारी हो जाता है

जब वो साठ बरस का हो जाता है


बुढापे में पुरुष पत्थर हो जाता है

बेटों के लिये वो फ़ालतू हो जाता है

आदमी कितना बेबस हो जाता है

जब वो साठ वर्ष का हो जाता है


ये आज कैसी परिपाटी चल रही है, 

अपने ही खून से जिंदगी छल रही है,

पत्नी में तू कितना गिरा हो जाता है

हीरे को तोड़ कितना शीशा हो जाता है


इस जीवंत खुदा की तू ईबादत कर

हरवक्त इस ख़ुदा को तू सजदा कर

इस जीवित भगवान के आगे तो, 

वो ख़ुदा भी बहुत छोटा हो जाता है


अब अपनी बेबसी को तू छोड़, 

जिंदगी को दे तू स्वर्णिम मोड़,

माता-पिता की सेवा करने से तो, 

बंद चराग भी रोशन हो जाता है।


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