आदमी का दुख
आदमी का दुख
बातें औरतों की हो तो पूरा समाज उठ जाता है
मगर एक वर्ग मर्दों का भी है जो अकेला सहता है
अपने मर्द होने के दावे को जहान में मजबूत बनाते हुए
अपने दर्द को छिपा कर आंसू रात के अंधेरे में बहाता है
सुनने को दास्तान एक औरत की ना जाने कितने ही कान है
कोई चुपके से सुन ले उस मर्द की भी वो तलाश करता है
नहीं, नहीं हर मर्द फौलाद का कलेजा नहीं रखता
एहसास जज़्बात प्यार वो भी दिल से महसूस करता है
क़ीमत अगर औरतों के औरत होने की चुकाई जाती है
तो एक मर्द भी उसी औरत के हाथों पल पल खर्च होता है।
